गणेश चतुर्थी, धर्म आस्था का जबरदस्त सैलाब, कहीं लोगों के मन में गणपति बप्पा क ो ठहरा कर सेवा करने का मन है तो कहीं लोगों के मन में इस पर्व के प्रति जोरदार तैयारियों का उत्साह। भगवान श्री गणेश के आगमन से विसर्जन तक रोचक और धार्मिक माहौल पूरे शहर को अपने रंगों में रंग लेगा। खतरा है तो बस मूर्तियों के केमिकल वाले रंगोें से। धर्म-आस्था से जुड़े यह कार्यक्रम संस्कृति को जीवंत तो करते हैं, लेकिन जीवनदायिनी यमुना को अधमरा कर देते हैं।
गणेश चतुर्थी का पर्व आ चुका है। बैंड बाजा और स्वागत रंगों से तो ध्वनि और वायुप्रदूषण होगा ही, इस मौके पर पूजी जाने वाली गणेश प्रतिमाओं के सार्वजनिक जलाशयों में विसर्जन से व्यापक पैमाने पर जल प्रदूषण भी होगा। मूर्तियों के विसर्जन से पानी की चालकता, ठोस पदार्थों की मौजूदगी, जैव रासायनिक आॅक्सीजन की मांग और घुले हुए आॅक्सीजन में कमी बढ़ जाती है। यमुना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का निष्कर्ष है कि इस कर्मकांड से नदी को भी काफी भरपाई लायक नुकसान हो रहा है और प्रदूषण फैल रहा है।
- नाकाफी रहीं पिछली योजनाएं -
एक स्थूल अनुमान के हिसाब से पिछली बार यमुना नदी में लगभग तीन हजार से अधिक मूर्तियों का विसर्जन हुआ। गौरतलब है कि नदी के प्रदूषण को रोकने के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च कर चुकी सरकारी एजेंसियों ने मूर्तियों के विसर्जन के लिए वैकल्पिक इंतजाम करने के दावे अवश्य किए थे, इस दिशा में कुछ व्यवस्था हुई भी थी, मगर निश्चित ही वह नाकाफी थी।
- बीस गुना तक बढ़ा था, क्लोराइड
कोई यह पूछ सकता है कि क्या वाकई मुद्दाा इतना गंभीर है या यह महज प्रचार का मामला है। पिछले साल की बात है जब यमुना नदी में अपने रासायनिक कचरे का अनुपात बढ़ा दिया था, तब यमुना में क्लोराइड का स्तर 500 मिलीग्राम प्रति लीटर पहुंच गया था स्वीकार्य स्तर से बीस गुना अधिक था। इसके परिणामस्वरूप शहर में बोतलबंद पानी की खपत अचानक बढ़ गई थी।
यमुना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार यमुना का अध्ययन कर बताया था कि किस तरह नदी का दम घुट रहा है और उसकी पानी जहरीला हो रहा है। बोर्ड के निष्कर्षों के मुताबिक सामान्य काल में पानी में पारे की मात्रा लगभग न के बराबर होती है, लेकिन धार्मिक उत्सवों के दौरान वह अचानक बढ़ जाती है। यहां तक कि क्रोमियम, तांबा, निकल, जस्ता, लोहा और आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का पानी में अनुपात भी बढ़ जाता है। अध्ययन करने के बाद बोर्ड ने पाया कि मूर्तियों के विसर्जन से पानी की चालकता (कंडक्टीविटी), ठोस पदार्थों की मौजूदगी, जैव रासायनिक आॅक्सीजन की मांग और घुले हुए आॅक्सीजन में ज्यादा कमी हो जाती है।
- सुझावों एवं प्रयासों की सार्थकता पर भी प्रश्न चिह्न
पिछले वर्ष कें द्रीय यमुना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पर्यावरणपूरक मूर्ति-विसर्जन को लेकर कुछ अहम सुझाव दिए। उसके मुताबिक मूर्तियों पर ऐसे केमिकल से बने रंगों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगनी चाहिए, जो जहरिले हों और नॉनबायोडिग्रेडेबल हों अर्थात घुलनशील न हों, सिर्फ प्राकृतिक तथा पानी में घुलनशील रंग ही इस्तेमाल हों, प्लास्टर आॅफ पेरिस के बजाय मिट्टी की मूर्ति बनाने को प्रोत्साहित किया जाए; पानी में बहाने के पहले मूर्तियों पर पड़े फूल, वस्त्र और थर्मोकॉल आदि अलग किए जाएं। यह सुझाव दिया गया कि ऐसे कृत्रिम तालाबनुमा गड्ढे बना दिए जाएं, जिनमें आसानी से विसर्जन हो सके ताकि विसर्जित की गई मूर्तियां समूचे सार्वजनिक जलाशय को प्रदूषित न करें। प्रयासों के बाद भी यमुना में होने वाले विसर्जन में कोई खास कमी देखने को नहीं मिली।
गणेश चतुर्थी का पर्व आ चुका है। बैंड बाजा और स्वागत रंगों से तो ध्वनि और वायुप्रदूषण होगा ही, इस मौके पर पूजी जाने वाली गणेश प्रतिमाओं के सार्वजनिक जलाशयों में विसर्जन से व्यापक पैमाने पर जल प्रदूषण भी होगा। मूर्तियों के विसर्जन से पानी की चालकता, ठोस पदार्थों की मौजूदगी, जैव रासायनिक आॅक्सीजन की मांग और घुले हुए आॅक्सीजन में कमी बढ़ जाती है। यमुना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का निष्कर्ष है कि इस कर्मकांड से नदी को भी काफी भरपाई लायक नुकसान हो रहा है और प्रदूषण फैल रहा है।
- नाकाफी रहीं पिछली योजनाएं -
एक स्थूल अनुमान के हिसाब से पिछली बार यमुना नदी में लगभग तीन हजार से अधिक मूर्तियों का विसर्जन हुआ। गौरतलब है कि नदी के प्रदूषण को रोकने के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च कर चुकी सरकारी एजेंसियों ने मूर्तियों के विसर्जन के लिए वैकल्पिक इंतजाम करने के दावे अवश्य किए थे, इस दिशा में कुछ व्यवस्था हुई भी थी, मगर निश्चित ही वह नाकाफी थी।
- बीस गुना तक बढ़ा था, क्लोराइड
कोई यह पूछ सकता है कि क्या वाकई मुद्दाा इतना गंभीर है या यह महज प्रचार का मामला है। पिछले साल की बात है जब यमुना नदी में अपने रासायनिक कचरे का अनुपात बढ़ा दिया था, तब यमुना में क्लोराइड का स्तर 500 मिलीग्राम प्रति लीटर पहुंच गया था स्वीकार्य स्तर से बीस गुना अधिक था। इसके परिणामस्वरूप शहर में बोतलबंद पानी की खपत अचानक बढ़ गई थी।
यमुना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार यमुना का अध्ययन कर बताया था कि किस तरह नदी का दम घुट रहा है और उसकी पानी जहरीला हो रहा है। बोर्ड के निष्कर्षों के मुताबिक सामान्य काल में पानी में पारे की मात्रा लगभग न के बराबर होती है, लेकिन धार्मिक उत्सवों के दौरान वह अचानक बढ़ जाती है। यहां तक कि क्रोमियम, तांबा, निकल, जस्ता, लोहा और आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का पानी में अनुपात भी बढ़ जाता है। अध्ययन करने के बाद बोर्ड ने पाया कि मूर्तियों के विसर्जन से पानी की चालकता (कंडक्टीविटी), ठोस पदार्थों की मौजूदगी, जैव रासायनिक आॅक्सीजन की मांग और घुले हुए आॅक्सीजन में ज्यादा कमी हो जाती है।
- सुझावों एवं प्रयासों की सार्थकता पर भी प्रश्न चिह्न
पिछले वर्ष कें द्रीय यमुना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पर्यावरणपूरक मूर्ति-विसर्जन को लेकर कुछ अहम सुझाव दिए। उसके मुताबिक मूर्तियों पर ऐसे केमिकल से बने रंगों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगनी चाहिए, जो जहरिले हों और नॉनबायोडिग्रेडेबल हों अर्थात घुलनशील न हों, सिर्फ प्राकृतिक तथा पानी में घुलनशील रंग ही इस्तेमाल हों, प्लास्टर आॅफ पेरिस के बजाय मिट्टी की मूर्ति बनाने को प्रोत्साहित किया जाए; पानी में बहाने के पहले मूर्तियों पर पड़े फूल, वस्त्र और थर्मोकॉल आदि अलग किए जाएं। यह सुझाव दिया गया कि ऐसे कृत्रिम तालाबनुमा गड्ढे बना दिए जाएं, जिनमें आसानी से विसर्जन हो सके ताकि विसर्जित की गई मूर्तियां समूचे सार्वजनिक जलाशय को प्रदूषित न करें। प्रयासों के बाद भी यमुना में होने वाले विसर्जन में कोई खास कमी देखने को नहीं मिली।

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