कहानी, एक औरत की, एक आजाद औरत की। जो हर रिष्ते को दिल से निभाने को तैयार रहती है लेकिन जब वही रिष्ते उसे तोडने की कोषिष करते हैं तो वह टूटने के बजाय जीती है। अपनी जिंदगी के लि जीती है।
आज़ाद..........
फिर वही हुआ था, उनके बीच। शक, दूरियां
और लड़ाई, फिर रिश्ते के वजूद पर प्रश्न उठते से नजर आ रहे थे। क्यों हैं, हम
एक साथ। दिन पर दिन लड़ाईयां बढ़ती जा रही थीं, अभिनव और अनामिका के बीच। हर
सुबह उन्हें रिश्ते को नए सिरे से शुरू करने का मौका देती लेकिन शाम ढलते-ढलते
कोई न कोई बात दोनों के रिश्ते में घुटन भर देती थी। उलझते जा रहे थे, दोनों
अपने-अपने जीवन में। नौबत यहां तक
पहुंच गई थी कि दोनों एक दूसरे के बारे में सोचने से भी कतराने लगे थे।
आज भी ऐसा ही कुछ हुआ था, सुबह उठते ही अभिनव ने अनामिका को चाय बनाकर लाने को
कहा। लहजा सामान्य था, अनामिका भी यह दिन अच्छे से गुजरने की आस लिए उठी और दो
कप चाय बनाकर ले आई। आज हम एक साथ ही चाय पियेंगे। मुस्कुराते हुए एक कप अभिनव
के हाथों में थमा दिया, अभिनव ने भी मुस्कुराहट का जवाब मुस्कान से दे दिया।
अनामिका ने पिछले दिनों हुई लड़ाईयों से बोझिल हुए हालातों को सुधारने के लिए
कोशिश की। अभिनव के कंधे पर सिर रखते हुए बोली, अभि, बहुत दिन हो गए हमने साथ
में आइसक्रीम नहीं खाई। तुम्हें याद है.............., बीच में बात काटते हुए,
ही अभिनव बोला, "तुम औरतें भी अजीब होती हो सुबह की चाय के समय पर तुम लोगों
को आइसक्रीम की याद कैसे आ सकती है?" "हम्म, तुम्हें तो कई औरतें सुबह की चाय
के समय उनके साथ खाई
आइसक्रीम की याद दिलाती होंगी।" बोलते हुए, अनामिका उखड़े मिजाज के साथ अभिनव
से दूर होकर बैठ गई थी। इस बात से अभिनव बुरी तरह चिड़चिड़ा गया, और बोला कि
"यार तुम शांति से नहीं रह
सकतीं तो ना रहो, लेकिन मुझे रहने दो।"
रोज ऐसी ही छोटी- छोटी बातों से दोनों की तकरार शुरू हो जाती थी। अभिनव बिगड़े
मूड के साथ आॅफिस चला जाता, और अनामिका रसोई और घर के बाकी कामों में अपना
पूरा दिन बिता देती।
अब दोनों में से किसी को पहले जैसी शाम का इंतजार नहीं
रहता था। रिश्ता बचने की गुंजाइश हर दिन खत्म हो रही थी। कभी अभिनव जिंदगी की
सबसे बड़ी भूल बोल कर अनामिका की भावनाओं को आहत करता तो
कभी अनामिका अभिनव के पुराने अफेयर्स
की चर्चा छेड़ते हुए, अपने रिश्ते को बेबुनियादी साबित कर देती। इस बार भी कुछ
ऐसा ही हुआ था, अनामिका ने किसी बात का ताना दिया और अभिनव आॅफिस का नाम लेकर
चला गया। बस बहुत हो गया, आने दो शाम को मुझे बस जवाब चाहिए कि इन्हें मेरे
साथ रहना है या नहीं? और अगर रहना है तो मेरी भावनाओं की कद्र
करनी पड़ेगी। और नही तो.... बोलते-बोलते सोच में पड़ गई थी वह। उसे वो दिन याद
आ गया जब वो सब कुछ छोड़ अपने अभि के पास आई थी, क्या, था उसके पास??? अभि ने
उसकी सारी ज़रूरतों को ध्यान में रख अपनी जीवन शैली ही बदल ली थी। अनामिका के
उदास होने पर कभी बच्चा बन जाता तो कभी लॉन्ग ड्राइव के साथ स्पेशल रबड़ी
कुल्फी। अभिनव ने भी कम मशक्कत नहीं की थी अपनी अनु को अपने पास रखने में।
भाई-बहन सबने ही तो बात करना बन्द कर दिया था। फिर भी अपने रिश्ते को मुकाम तक
पहुंचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी उसने। और आज इन लड़ाइयों से वो प्यार वो
रिश्ता खत्म थोड़े ही हो जाएगा।
भले ही दोनों में तमाम झगड़े होते हैं, गृहस्थ जीवन की उलझनों में दोनों उलझे
हैं लेकिन प्यार, वो तो कम नहीं हुआ है और दोनों का एकदूसरे के अलावा और कोई है
भी तो नहीं। सालों से एक दूसरे के दुख-सुख को एक साथ संभाला है दोनों ने। ऐसे
में दोनों कैसे एक दूसरे के बिना रहने के बारे में भी सोच सकते
हैं। थोड़ा असहज हो गई थी, अनामिका। सोचने
लगी.........अरे, शाम तक की ही तो बात है, कर लेंगे बात, सब ठीक हो जाएगा। उठ
घर के काम समेटने लगी थी, बड़बड़ाती हुई बोली मैं भी कोई जाॅब पकड़ लेती हूं,
वरना ऐसे ही खाली दिमाग में बेवजह की बातें आती रहेंगी। आज ही अभि
से बात करूंगी। नजरें अचानक घड़ी पर जाती हैं, अरे, साढ़े पांच बज गए, आते ही
होंगे, तैयार हो जाती हूं। ये बेअदब रहन- सहन देखेंगे तो मूड और खराब हो
जाएगा।
अभिनव के पसंदीदा नीले रंग का सूट पहन कर नजरें दरवाजे पर उसके आने का इंतजार करने लगीं। वही
सूट जो बर्थडे भूलने का नाटक कर बतौर सरप्राइज लाकर दिया था। अक्सर जब अभिनव
और अनामिका में अनबन होती तो बिना सॉरी बोले एक दुसरे को मनाने का बहुत खूब
तरीका था ये। अनामिक अभिनव का दिया कोई सूट पहन लेती और अभिनव अनामिक की दी
हुयी शर्ट। और फिर एक दुसरे को देख खिलखिला जाते।
आज भी कुछ ऐसा ही हुआ,
अनामिका उसी खिलखिलाट का इंतज़ार करती हुयी दरवाज़े पर कान लगा कर घर के काम
समेटने लगी। घड़ी की
सुई आगे बढ़ती जा रही थीं, उसी के साथ अनामिका की बेचैनी भी। रोज साढ़े पांच तक
आ जाते हैं, अब तो सात बज गया है। फोन करती हूं, कमरे में सेल फोन उठाने रूम
में गई ही थी।
तभी डोर बेल बजी। वो मानो भागती हुयी सी दरवाज़े पर पहुंची, फिर रुक खुद को एक
बार देख दरवाज़ा खोला। अभिनव का सरवेंट था, गाड़ी की चाबी हाथ में थमा के बोला
कि "साहब ने गाड़ी घर छोड़ने को बोला है।" लेकिन
"साहब कहाँ हैं?" अनामिका ने बढ़ती बेचैनी
के साथ नौकर से पूछा। "पता नहीं मैडम मुझे तो बस यह गाड़ी घर छोड़ने के लिए बोला
तो मैं देने आ गया।" "अच्छा, ठीक है।" बेचैनी को छिपाते हुए अनामिका ने दरवाजा
बंद कर लिया। अजीब हैं, ये। यह कोई तरीका है, कुछ बताया भी नहीं कि कहां जा
रहे हैं, बस गाड़ी भिजवा दी। अब फिर फोन से ही लड़ाई शुरू हो जाएगी।......... अनामिका
के माथे पर शिकन भरी लकीरें उभर आईं थीं।
अभिनव का नंबर डायल किया लेकिन नंबर
तो बंद है, दूसरा नंबर भी नाॅट रिचेबल था। हद करते हैं ये। हो सकता है राजीव
भइया को पता हो कि ये कहां गए है? इतना सोच अभिनव के दोस्त के राजीव का नंबर
डायल किया, नमस्ते भइया, कैसे हैं आप? राजीव ने भी पूरे मिलनसार तरीके से
नमस्कार का जवाब देते हुए, अपनी खैरियत से होने की सूचना दी। अनामिका ने अपनी
बात कहने में बिल्कुल देर न लगाई, भइया, अभिनव का कोई प्लान था क्या? नौ बजने
वाला है, लेकिन अभी तक नहीं आए। गाड़ी भी सरवेंट के साथ घर भिजवा दी और फोन भी
बंद है। ये सब अनामिका एक सांस में बोल गई थी। राजीव ने अनामिका को समझाते हुए
बोला कि भाभी मुझे तो कुछ नहीं बताया कि कहां जा रहा है, आॅफिस में भी कोई ऐसा
जिक्र नहीं छेड़ा। खैर, आप
परेशान ना हो मैं अभी पता करता हूं। वो आ जाए तो मुझे खबर कर दीजिएगा। यह कहते
हुए
राजीव ने फोन रख दिया।
अनामिका को कुछ समझ नहीं आ रहा था, कि वह क्या करे?
कुछ दिन पहले की ही तो बात है, जब अभिनव और अनामिका में ज़बरदस्त झगड़ा हुआ था।
और अभिनव चीख कर बोला था, कि "मुझे तो अब इस घर में सुकून नाम की चीज़ मिलती ही
नहीं। चला जाऊँगा किसी दिन, दूर...बहुत दूर.......। ढूंढती रह जाओगी लेकिन
नहीं आऊंगा वापस।" अनामिक भी कम कहाँ थी, "अरे जाओ न फिर, सुनो वरना मैं ही
पागल थी जो, तुम्हारे लिए सब कुछ छोड़ कर आ गयी, दिन रात मेहनत की तुम्हारे
कंधे से कन्धा मिलाकर सब कुछ सम्भाला, उसी वजह से आज यहाँ तक पहुँच पाये हो
वरना रह जाते वहीं, उस 9 टू 5 वाली नौकरी के जंजाल में। लेकिन यहाँ मेरी कदर
किसे। तुम चले जाओ नहीं तो मैं चली जाऊं।........ कुछ दिन की चुप्पी के बाद और
लड़ाइयों की तरह ये लड़ाई भी खत्म हो गयी। और दोनों को एक दुसरे को छेड़ने का एक
मौका और मिल गया। दोनों में कुछ अनबन शुरू होती तो, दोनों एक दुसरे को कह देते
"क्यों कहीं जाना है?" ये टोंट कभी दोनों का गुस्सा फुर्र कर देता तो कभी बात
को और बड़ा देता। लेकिन एक दुसरे से दूर जाना नामुमकिन लगता। अनामिका तो कई बार
जाने के नाम से घर के कोने में बैठ रो भी चुकी थी। और कारण भी था,
सारे रिश्ते तोड़ चुकी थी वो, अभिनव की खातिर। सालों से किसी से बात भी तो नहीं
हुई थी। और आज अचानक अभिनव के कहीं चले जाने से वो बहुत घबरा गयी, ऐसा तो कभी
नहीं किया अभिनव ने। किससे मदद ले, अब वो? अभिनव कभी वापस नहीं आया तो क्या
करेगी वो? पूरी रात सोफे पर बैठ दरवाज़े को ताकते हुये निकाली। 24 घंटें बाद
पुलिस को सूचना दी। लेकिन अभिनव नहीं मिला।
हर आहट अनामिका को चौंका देती। अपना सारा अहम छोड़ उन रिश्तेदारों के घर भी अभिनव को ढूंढती हुयी चली गयी थी, जिनको वो देखना भी नहीं चाहती थी। हर दिन अभिनव की खोज की आस लिए उठती और शाममायूसी के साथ अंधेरों में ले जाती। नींद तो जैसे आँखों से उतनी ही दूर हो गयी थी, जितना उसका अभिनव। अभिनव की ज़रा सी कोई खबर मिलने पर जितनी तेज़ रफ़्तार से दौड़ती, लौटते समय उतने ही भारी क़दमोंसे लौटकर अपने कामों में जुट जाती। कई बार मौत को गले लगाने का भी मन में आया लेकिन हार ना मानने वाली अनामिका बस जीती रही।
दिन-महीने-साल यूं ही बीतते चले
गए। अनामिका ने भी अपना जीवन नए सिरे से शुरू कर दिया था। एक प्राइवेट कंपनी
में 9 टू 5 नौकरी और अपना छोटा सा घर। अभिनव का घर भी छोड़ चुकी थी वह। पूरी
जिंदगी अकेले बिताने का फैसला ले चुकी थी।
हर छोटी-बड़ी बातों में उसे अभिनव की याद आ जाती। प्यार के शुरूआती दिन, जब जब
मिलते जीवन भर साथ रहने के सपने देखते। शहर के अधिकतर बड़े बड़े मंदिर और मस्जिद
पर मन्नतें मांग आये थे। एक दिन जो रह रह कर अनामिका को याद आकर कभी भी रुला
जाता, दोनों ने एक दूसरे को पाने के लिए व्रत रखा था, रोज़ सुबह अनामिका घर के
बाहर अभिनव से मिलती। अभिनव अपने हाथों से खाना बना कर अपनी अनु के लिए लाता।
पहले दोनों मंदिर जाते फिर वहीं कहीं एकांत में गाड़ी रोक दोनों साथ व्रत
तोड़ते। महीनों चले इस सिलसिले ने अनामिका और अभिनव एक ही जीवन की डोर में बाँध
दिया था, एक दुसरे के बिना रहना तो दूर, एक घंटा भी एक दुसरे के बिना गुज़ारना
मंज़ूर नहीं था। इसी बीच घरवालों ने अनामिका की शादी तय कर दी, रो-रोकर बुरा
हाल कर दिया था उसने। वहीं अभिनव किसी न किसी तरह उसकी शादी तुड़वाने में जुट
गया। दोनों ने घरवालों को खूब समझाया लेकिन वो नहीं माने। आखिरकार अनामिका ने
घर छोड़ दिया और निकल आई उस बंदिशों भरी दुनिया से दूर अपने अभि की दुनिया में
वहां न कोई बंदिश थी, और न कोई उलझन। वहां था तो बस प्यार, एक दूसरे के लिए
बेशुमार प्यार। अनामिका के अभिनव के पास आने के बाद शायद ही ऐसा कोई दिन हो,
जिसमें दोनों ने एक दूसरे के बिना खाना खाया हो। दोनों की जीवन शैली खुद में
ही उलझी रहती। इसी तरह जीवन चलने लगा और दोनों प्रेमी-प्रेमिका से पति-पत्नी
बन गए। लड़ाई-झगडे भी हुए लेकिन एक-दुसरे से दूर जाना दोनों को अभी भी गवारा
नहीं था लेकिन एक दिन हुए झगड़े ने जैसे रिश्ते की बुनियाद को हिला दिया। छोटी-छोटी बातों पर अनामिका को ताने देना तक तो ठीक था लेकिन नशे में धुत्त सहपाठी या यूँ कहें पूर्व प्रेमिका के साथ घर आना औरअनामिका के विरोधी व्यवहार पर उसके सामने ही अनामिका पर हाथ उठाना , सारी सीमाओं से ऊपर था। जमकर लड़ाई हुयी थी दोनों में, महीनों बन्द बात-चीत के बाद दोनों एक दुसरे के फिर करीब आने की कोशिश कररहे थे, एक नाकामयाब कोशिश।
बदलते समय के साथ अनामिका भी बदलने लगी थी, अब वह अभिनव के दायरों से बाहर निकल अपना मुकाम बना रही थी। घर, ऑफिस, डांस क्लासेस कितना कुछ तो था उसके पास करने के लिए। अपनी ज़िन्दगी मेंखुश थी। दोस्तों से मिलने आस -पास के बच्चों के साथ खेलने में उसे ख़ुशी मिलती। घरवालों से भी बातचीत होने लगी थी लेकिन उनसे बात करने से बचती ही थी वह। "हमारी मानी होती तो ये सब नहीं देखना पड़ रहाहोता।" घरवालों के कुछ ऐसे ताने उसको अक्सर सुनने पड़ते। साथ ही रिश्तेदारों में बड़ी उम्र या तलाकशुदा लड़कों की लंबी लिस्ट उसके सामने रख दी जाती। दोस्त और कलीग भी अक्सर उसे दूसरी शादी करने की सलाहदेते रहते। लेकिन हर उस सलाह से बस चिढ़ कर ही रह जाती। इसका मतलब ये बिलकुल नहीं था कि वह अभिनव से अभी भी प्यार करती थी।
भले ही अभिनव परिस्थितियों से भाग गया लेकिन उसके चले जाने के बाद कोई
दूसरा उसका साथ निभाएगा, यह वः मान ही नहीं पा रही थी। अनामिका में तो जैसे दोबारा शादी और किसी पर भरोसा करने
का साहस अब बचा ही नहीं था। हर रोज की ही तरह उस शाम आॅफिस से लौटी और अपने
लिए चाय बनाने लगी साथ ही टीवी पर पुराने गाने लगा दिए। तभी फोन की घंटी बजी।
रिसीव करते ही, सहम गई। लाइन पर अभिनव की आवाज थी। हैलो अनामिका, नहीं पुछूंगा
कि तुम कैसी हो? बस यह कहना चाहता हूं कि तुमसे दूर जाने के बाद मैं एक दिन के
लिए सुकून नहीं रहा। कई बार घर जाकर तुम्हें तलाशने की कोशिश की लेकिन तुम घर
छोड़ चुकी थीं। यह तो अच्छा हुआ कि तुमने अपना नंबर नहीं बदला। बड़ी मुश्किल से
तुम्हें फोन करने की हिम्मत जुटा पाया हूं। खैर, नंबर न बदलने से एक बात साफ
है कि तुम्हें भी यकीन था कि मैं वापस आउंगा। मैं आ गया हूं, अनु। बताओ कब और
कहां मिलोगी मुझसे?......
अनु??? इस नाम से तो अभिनव उसे शादी से पहले बुलाया करता था। और कितना विश्वास
है, उसे कि मैं उससे मिलूंगी, कभी नहीं मिलूंगी। यह सब अनामिका मन नही मन सोच
रही थी। बोलो अनु... अभिनव ने फिर आवाज लगाई। अनामिका ने उत्तर दिया, कौन
अनु?? यहां सिर्फ अनामिका रहती है, सिर्फ अनामिका। और सुनो यह नंबर न बदलना
मेरी सबसे बड़ी गलती थी। मैं अपना जीवन अपने तरीके से जीने में पूरी तरह समर्थ
हूं। मुझे किसी की जरूरत नहीं है।
इतना कह कर अनामिका ने फोन डिस्कनेक्ट किया और सिम निकाल कर तोड़ दी। अजीब घुटन
से आजाद हुई थी, आज वो। फोन नंबर... शायद यही उसके जीवन की घुटन का आखिरी कारण
था। आज वो आजाद है, बिल्कुल आजाद।
