शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

अरे वंदना तुम आज का व्रत क्यों रख रही हो यहअहोई अष्टमी का व्रत तो लड़को के लिए
रखा जाता है, और तुम्हारे तो बेटी हुइ है?
वंदना थोडा सकपकाई फिर( खुद पर मानो गर्व कर
रही हो ) बोली,
तो भाभी ??? स्वस्थ जीवन का हक
केवल लड़को का है क्या? मेरी बेटी ने
मुझे माँ बनने का गौरव दिया, वही शब्द का अधिकार
मिला जो आपके बेटे ने आपको दिया। मैंने
अपनी बेटी को जन्म देने में
उतनी पीड़ा उठाई है
जितनी आपने बेटे को जन्म देने में, तो आज का यह
व्रत केवल लड़को के लिए क्यूँ ?
गर्व है मुझे वंदना जैसी और माहिलाओ पर जो बेटे
या बेटी की नहीं सिर्फ एक
माँ हैं। माँ नारीत्व का सबसे बड़ा सम्मान है, हर
स्त्री को इस सम्मान की गरिमा का ध्यान
रखना चाहिए।

रविवार, 12 अक्टूबर 2014

करवाचौथ, अधूरा त्योहार....

करवाचौथ, अच्छा लगता है मुझे यह त्योहार। जीवन के सबसे प्यारे साथी के लिए बेशुमार प्यार। इस बार भी जब यह त्योहार आया तो खुशी मिली, लेकिन पत्रकारिता बुद्धि ने इसके दूसरे पहलू पर नजर डालने पर मजबूर कर ही दिया। घर में मां, चाची, बुआ, दीदी, भाभी ने व्रत रखा सुबह से बिना पानी पिए पति की लम्बी और स्वस्थ उम्र की कामना की, तो ये पति लोग पत्नी की लम्बी उम्र और स्वस्थ जीवन नहीं चाहते क्या? एक पारिवारिक जीवन में जितनी जरूरत एक पुरूष की होती है, उतनी ही आवश्यकता एक महिला की भी होती है। यदि पुरूष परिवार की आजीविका का साधन है, तो महिला की सूझ-बूझ उस आजीविका को सुचारू रूप से सहेज परिवार के भविष्य को संवारती है। ऐसे में मात्र पति की उम्र ही लम्बी हो, इसमें मुझे तर्क नजर नहीं आता। यह त्योहार पुरूष प्रधान त्योहार है। जिससे महिलाएं वर्षों से परंपराओं का हिस्सा मान मनाती चली आ रही हैं। समय के साथ इस परंपरा क ो भी बदलना होगा। यह तभी संभव है, जब पति अपनी पत्नी के लिए करवा चौथ या अन्य कोई निर्जल व्रत रखेंगे।     

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

धर्म, आस्था, पूजन.....यमुना???


गणेश चतुर्थी, धर्म आस्था का जबरदस्त सैलाब, कहीं लोगों के मन में गणपति बप्पा क ो ठहरा कर सेवा करने का मन है तो कहीं लोगों के मन में इस पर्व के प्रति जोरदार तैयारियों का उत्साह। भगवान श्री गणेश के आगमन से विसर्जन तक रोचक और धार्मिक माहौल पूरे शहर को अपने रंगों में रंग लेगा। खतरा है तो बस मूर्तियों के केमिकल वाले रंगोें से। धर्म-आस्था से जुड़े यह कार्यक्रम संस्कृति को जीवंत तो करते हैं, लेकिन जीवनदायिनी यमुना को अधमरा कर देते हैं।
गणेश चतुर्थी का पर्व आ चुका है। बैंड बाजा और स्वागत  रंगों से तो ध्वनि और वायुप्रदूषण होगा ही, इस मौके पर पूजी जाने वाली गणेश प्रतिमाओं के सार्वजनिक जलाशयों में विसर्जन से व्यापक पैमाने पर जल प्रदूषण भी होगा। मूर्तियों के विसर्जन से पानी की चालकता, ठोस पदार्थों की मौजूदगी, जैव रासायनिक आॅक्सीजन की मांग और घुले हुए आॅक्सीजन में कमी बढ़ जाती है। यमुना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का निष्कर्ष है कि इस कर्मकांड से नदी को भी काफी भरपाई लायक नुकसान हो रहा है और प्रदूषण फैल रहा है।
- नाकाफी रहीं पिछली योजनाएं -
एक स्थूल अनुमान के हिसाब से पिछली बार यमुना नदी में लगभग तीन हजार से अधिक मूर्तियों का विसर्जन हुआ। गौरतलब है कि नदी के प्रदूषण को रोकने के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च कर चुकी सरकारी एजेंसियों ने मूर्तियों के विसर्जन के लिए वैकल्पिक इंतजाम करने के दावे अवश्य किए थे, इस दिशा में कुछ व्यवस्था हुई भी थी, मगर निश्चित ही वह नाकाफी थी।
- बीस गुना तक बढ़ा था, क्लोराइड
कोई यह पूछ सकता है कि क्या वाकई मुद्दाा इतना गंभीर है या यह महज प्रचार का मामला है। पिछले साल की बात है जब यमुना नदी में अपने रासायनिक कचरे का अनुपात बढ़ा दिया था, तब यमुना में क्लोराइड का स्तर 500 मिलीग्राम प्रति लीटर पहुंच गया था स्वीकार्य स्तर से बीस गुना अधिक था। इसके परिणामस्वरूप शहर में बोतलबंद पानी की खपत अचानक बढ़ गई थी।
यमुना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार यमुना का अध्ययन कर बताया था कि किस तरह नदी का दम घुट रहा है और उसकी पानी जहरीला हो रहा है। बोर्ड के निष्कर्षों के मुताबिक सामान्य काल में पानी में पारे की मात्रा लगभग न के बराबर होती है, लेकिन धार्मिक उत्सवों के दौरान वह अचानक बढ़ जाती है। यहां तक कि क्रोमियम, तांबा, निकल, जस्ता, लोहा और आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का पानी में अनुपात भी बढ़ जाता है। अध्ययन करने के बाद बोर्ड ने पाया कि मूर्तियों के विसर्जन से पानी की चालकता (कंडक्टीविटी), ठोस पदार्थों की मौजूदगी, जैव रासायनिक आॅक्सीजन की मांग और घुले हुए आॅक्सीजन में ज्यादा कमी हो जाती है।
- सुझावों एवं प्रयासों की सार्थकता पर भी प्रश्न चिह्न
पिछले वर्ष कें द्रीय यमुना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पर्यावरणपूरक मूर्ति-विसर्जन को लेकर कुछ अहम सुझाव दिए। उसके मुताबिक मूर्तियों पर ऐसे केमिकल से बने रंगों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगनी चाहिए, जो जहरिले हों और नॉनबायोडिग्रेडेबल हों अर्थात घुलनशील न हों, सिर्फ प्राकृतिक तथा पानी में घुलनशील रंग ही इस्तेमाल हों, प्लास्टर आॅफ पेरिस के बजाय मिट्टी की मूर्ति बनाने को प्रोत्साहित किया जाए; पानी में बहाने के पहले मूर्तियों पर पड़े फूल, वस्त्र और थर्मोकॉल आदि अलग किए जाएं। यह सुझाव दिया गया कि ऐसे कृत्रिम तालाबनुमा गड्ढे बना दिए जाएं, जिनमें आसानी से विसर्जन हो सके ताकि विसर्जित की गई मूर्तियां समूचे सार्वजनिक जलाशय को प्रदूषित न करें। प्रयासों के बाद भी यमुना में होने वाले विसर्जन में कोई खास कमी देखने को नहीं मिली। 

जन-जन रावण, घर-घर लंका...

जन-जन रावण, घर-घर लंका, इतने राम कहां से लाऊं? कुछ ऐसा ही हाल है, शहर में महिलाओं का। कभी घर में तो कभी कार्यस्थल पर किसी ना किसी तरह महिलाओं को पुरुष रूपी रावणों का सामना करना पड़ता है। इज्जत और मजबूरी के चलते अधिकतर महिलाएं अपनी आवाज को दबा तो लेती हैं, लेकिन फिर भी उन्हें इंतजार रहता है कि कोई ना कोई राम आए और उनकी इज्जत के लिए आवाज उठाए और मार गिराए उन तमाम रावणों को जो उनके जैसी ना जाने कितनी सीताओं  की इज्जत पर ताक लगाए बैठे हैं।
शहर में तमाम महिला जागरुकता और सुरक्षा के बाद अभियानों के माध्यम से महिलाएं बाहर की दुनिया में तो सुरक्षित हुई हैं, लेकिन घरों, स्कूल-कॉलेजों एवं आॅफिसों में फैली असुरक्षा का क्या? वुमेन हेल्प लाइन और साइकलॉजी काउंसलिंग सेंटर के  आंकड़ों पर ध्यान दें तो आज हर तीसरे घर में से एक युवती या महिला यौन प्रताड़ना का शिकार हो रही है। सामाजिक दबाव तो कभी आर्थिक मजबूरी के चलते बात को वहीं दबाने की कोशिश में लगी रहती हैं।    
- रोज बढ़ रहे यौन प्रताड़ना के मामले
वुमेन पॉवर हेल्पलाइन के प्रोविजनल अधिकारी राघवेंद्र सिंह ने बताया कि यौन प्रताड़ना के मामले अधिकतर युवतियां बताने में कतराती हैं, और बताती भी हैं तो उनकी स्पेशल रिक्वेस्ट रहती है कि घर या आॅफिस में आस-पास किसी को पता नहीं चल पाए। आगरा शहर की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि शहर में प्रताड़नाएं पहले भी होती रही हैं, लेकिन वुमेन पॉवर हेल्पलााइन की मदद से अब अधिक से अधिक युवतियां अपनी समस्या बेझिझक बता देती हैं। पिछले दो महीने के रिकॉर्ड के अनुसार आगरा से लगभग 250 मामले यौन प्रताड़नाओं के दर्ज हुए हैं।
- कभी कानून तो कभी वुमेन हेल्पिंग लाइन देती सहारा
आज के समय में युवतियां और महिलाएं घर से बाहर जाकर हर माहौल से लड़ने को तैयार हैं, वहीं दूसरी ओर घरों एवं कार्यस्थलों में ही उनके साथ बदसलूकी की परिस्थितियां थम नहीं रही हैं। यही कारण है कि महिलाएं अपना अधिकार समझकर कानून और हेल्पलाइन से सहायता मांगने से नहीं झिझकतीं। एक युवती को विरोध करते देख, प्रताड़ना झेल रही दूसरी युवती भी अपनी आपबीती सुनाने की हिम्मत जुटाने के लिए तैयार हो पाती है।    
- सीता बनने से नहीं चलेगा काम
विजय नगर कॉलोनी निवासी निहारिका गुप्ता(काल्पनिक नाम) बताती हैं कि बचपन से मेरे मामा मेरे साथ गंदीं हरकतें किया करते थे। पहले मम्मी को बताने की कोशिश की लेकिन मम्मी ने मेरी बातों को सही नहंी माना, और कहा कि मुझे गलतफहमी है। उसके बाद बड़े होने पर मामा के आने पर अपने सार्थक प्रयासों के साथ उनसे दूर रहती थी, लेकिन फिर भी वह किसी ना किसी बहाने मेरे पास आकर मेरा शोषण करते थे। लगभग छह महीने पहले मैंने वुमेन पॉवर हेल्प लाइन में अपनी समस्या बताई और उनसे गुजारिश की कि यह मामला मेरे और मामा के बीच में ही रहे, हेल्पलाइन ने पूरा सहयोग किया। मामा ने आकर मुझसे माफी मांगी और कहा कि अब ऐसा कभी कुछ नहीं होगा। आज खुद को बहुत स्वतंत्र महसूस करती हूं। अपनी सहेलियों के समक्ष मैंने अपने साथ घटी घटना को कभी नहीं छिपाया, और यह भी बताती हूं कि किस तरह से मैंने उस समस्या से निजात पाया। ताकि अधिक  से अधिक लड़कियां अपने साथ हो रही प्रताड़नाओं को बता सकें।