बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

मेरा संस्मरण... "गुड्डो की विदाई"

"गुड्डो की विदाई"


सुबह की पहली किरण आज घर में हलचल लेकर आई थी। वैसे तो पापा रोज़ ही जल्दी उठते लेकिन इस रात तो शायद सोये ही नहीं। एक दिन बचा था बसजब अपनी लाडो की सारी ख्वाहिशें हक़ से पूरी कर सकते थे। पल-पल उसके कमरे में झाँक आते कि अभी तक उठी क्यों नहींतभी कमरे से अलसायी गुड्डो ने आवाज़ लगाई मेरा चश्मा नहीं मिल रहा। पापा लगभग भागते हुए से उसके कमरे में पहुंचेक्या हुआबेटा??? गुड मॉर्निंगपापू। देखोन मेरा चश्मा नहीं मिल रहा। लेकिन पापू को तो बस उस मासूम चेहरे को देखना था। मैं ढूंढ कर देता हूँतू बाहर आजा। लाडली को अपने हाथों का सहारा देकर उठाया। उसने भी उठते ही जोर से पापा को हग किया और गाल पर एक किस्सी जड़ दी। "मिल जाएगा चश्माआप चलो मेरे साथ।कमरे से बरांडे तक के चार कदम दोनों की आँखों में ढेरों आंसू ले आये थे। गुड्डो पापा के सीने से लगी चली जा रही थी.... वहीं पापा उसको अपने से इतना चिपका रहे थे कि वो उनके आंसू ना देख ले। दोनों चुपचाप इसी तरह बरांडे के सोफे पर आकर बैठ गए। बता आज क्या खायेगी??? मैं वही लेकर आऊंगा।..... धीरे से अपनी गर्दन उठाकर पापा को यूँ ही देखती रही। बोल ना बेटाक्या खायेगीमैं अभी लेकर आता हूँ।..... पापामुझे नहीं जाना आप लोगों से दूर। मैं हमेशा आपके पास रहना चाहती हूँ। मैं हर सुबह आपको गले लगाकर गुड मॉर्निंग करना चाहती हूँ।.................. पापा चुप थेगला रुंध गया था उनका। बेटी को गले से लगाकर मन ही मन सोचने लगेक्यों भेजना पड़ता है बेटियों को अपने से दूर। क्यों मैं उन्हें अपने पास नहीं रख सकता। बिटिया की हर ख्वाहिश पूरी करने वाले पापा के पास आज अपनी गुड्डो को कहने के लिए कुछ भी नहीं था। बोलो न कुछआज मेरी बातों का जवाब नहीं दोगे??? गुड्डो ने पापा की चुप्पी तोड़ने की कोशिश की। पापा ने सहज रहने का नाटक कर उससे बोलाचल पागलहर लड़की को अपने माँ-बाप के घर से एक दिन जाना पड़ता है। और तुझे मैं दूर थोड़े ही भेज रहा हूँ। तू तो जब चाहे तब हमसे मिलने यहाँ आ सकती है।...... गुड्डो उनको इतना कह बस देखती रह गयीउन्होंने भी जैसे अपनी लाडो को दूर कर हटने की कोशिश कीदूर हटने की या यूँ कहें कि सबसे अलग जाकर रोने की। उसके सामने कैसे रो सकते थे??? पापा जो थेबिटिया के बॉर्नहुड हीरो।
 कितना कुछ याद आ रहा थाआज उन्हें। गुड्डो के नन्हे कदमस्कूलकॉलेज और उसकी रसोई। हर रोज़ एक नया खेल सूझता थाकभी डॉक्टर-डॉक्टर तो कभी घर के कोने में रखे बक्से में घर-घर। हर खेल के साथ नयी फरमाइशें। जब भी दिल्ली जाते उसके लिए अलग-अलग गुड़ियाएं ले आते। वो गुलाबी प्लास्टिक की गुड़िया तो सालों अपने पास ही सुलाती थीऔर जो किसी ने उसे हाथ भी लगाया तो बस शामत ही आनी थी। ऐसी ही मासूमियत और शैतानी से भरी गुड्डो की यादें उनकी आँखों से छलकती हुयी उनके पैरों पर सिर रख लेटी गुड्डो के माथे पर गिर गयीं। उसने पापा को देखाफिर शैतानी में बोलीलो मम्मी देखोविदा मेरी हो रही है और रो ये रहे हैं। फिर उसने पापा को देख उनको गले लगा एक किस्सी जड़ दी। अच्छा सुनबहुत काम है। तुझे कुछ चाहिए तो जल्दी बता क्योंकि फिर मुझे मैरिज होम भी जाना है। ऐसा लग रहा थापापा हर पल में गुड्डो की ख्वाहिश पूरी कर देना चाहते थे। अब आंसू गुड्डो की आँख में भी था। क्योंआज के बाद आप मेरे मन का कुछ लाकर भी नहीं दोगे?? और फिर एक बार पापा के गले से लग फूट-फ़ूट कर रोने लगी। पापा की आवाज़ जैसे सीने में ही दब गयी। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए जल्दी से उठ कर बिना उसकी तरफ देखे बोलते हुये चले गए। जल्दी तैयार हो जामैं तेरे लिए कचोड़ी जलेबी ला रहा हूँ। कचोड़ी और जलेबी की बात दोनों के चेहरे पर चाशनी जैसी मुस्कान ले आई थी। कचोड़ी-जलेबी............ ये ही तो वो चीज़ें थीजो अक्सर सुबह को स्वादिष्ट बना दिया करती थी। सुबह उठते भूख से चिल्लाती गुड्डो को जब कुछ ढंग का मतलब जो उसके खाने का मन न हो वैसा कुछ मिलता तो वो पापा के पीछे-पीछे घूमती। पापा उसकी इन हरकतों से अच्छे से वाकिफ थे तो पहले तो परेशान करने के लिए अनजान बने अपने काम में मस्त रहतेफिर बोलतेचल तैयार हो जा स्कूटर निकाल रहा हूँ। इतना सुनते ही खुश होकर चिल्लातीमैं तो कब से तैयार हूँ। फिर दोनों निकल पड़ते कचोड़ी की दुकान पर। ऐसी ही छोटी-छोटी खुशियों ने एक बड़ा जहाँ बना लिया थागुड्डो का स्कूल,फिर कॉलेजजॉब और अब ये शादी के बाद ससुराल। हर एक पल में पापा की भागीदारी उससे तो दोगुनी ही थी।
 आज से पहले जब भी शादी की बात चलती तो गुड्डो के पैर तो जैसे जमीन पर टिकते ही नहीं थेमम्मी से भी अक्सर छोटे-छोटे काम करते हुए कुछ न कुछ फरमाइशें चलती ही रहतीं। "सुनोमम्मी मुझे न मेरी शादी पर एक ओवन ज़रूर देना। मैं किसी के लिए बारबार खाना गर्म करने नहीं उठूंगी। इस बात पर मम्मी उसे चिढ़ाने के लिए बोलतीं। "मैं तो नहीं दे रही तुझे। सारी गृहस्थी का सामान क्या यहीं से लेकर जायेगी??अपने पति से बोलना वो लाकर देगा।तभी अपना दिमाग चलाते हुए बोलती "सही बात हैकरोड़ों में एक बेटी दे रहे हो आप लोग अपनी। मेरे लिए इतना नहीं करेगा। तभी दिमाग की सुई पापा की ओर घूमती और उनसे बोलती "पापा ऐसा ही दामाद ढूंढना जो आपके इस सिर दर्द को अपने सिर पर बैठाने के लिए तैयार हो। वरना कर देना दूर से राम-राम।और आज जब विदाई को कुछ घंटे पहले गुड्डो उसकी हर छोटी बड़ी ज़रुरत के लिए पापा को भागती देख रही तो बारबार अपने पापा को बोली, " रहने दो,पापा । ये छोटी-छोटी चीज़ें हैंमैं मैनेज कर लूँगी। गुड्डो की इस समझदारी पर गर्व की जो बड़ी वाली मुस्कुराहट थीवो उस समय उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि महसूस हो रही थी। इन सबके बीच रस्मों रिवाज़ का चलन भी ज़ोरों पर था। आँगन में पट्टे पर बैठरस्में निभाती हुयी पापा को भागते देख रही थी। कभी मैरिज होम के लिए सामान देखते हुए तो कभी बजट के लिए गिनतियों में उलझे हुए। कुछ काम पड़ने पर छोटी बेटी की जगह गुड्डो का नाम ही जुबान पर बार बार आ जाता और तभी कुर्सी पर बैठी बड़ी बुआ उन्हें टोकते हुए बोलतीं, "अरे छोटेगुड्डो अब जा रही है अब इसका नाम भूल जा।इतना कहाँ बर्दाश्त थासनकी गुड्डो को। "क्यों बुआ जी,क्यों भूल जाएँ वो मेरा नामशादी हो रही हैइसका ये मतलब बिलकुल नहीं कि इनका मुझ पर अधिकार खत्म हो गया। मेरे पापा को जब ज़रुरत होगी मैं उनके कंधे से कन्धा मिला कर साथ खड़ी मिलूंगी।" "अच्छा चलडॉयलॉग मत मारचुपचाप ये रस्मे निभा और अंदर जाकर बैठ।"  पापा ने उसी गर्व वाली मुस्कान से बिटिया को अंदर जाने के निर्देश दे दिए। बिटिया भी पूरे लाड़ में पापा की आज्ञा का पालन करते हुए अंदर चली गयी। अचानक बहुत बड़ी हो गयी थी गुड्डोया यूँ कहो कि उसमे इतनी समझदारी छुपी हुयी हैये पापा समझ ही नहीं पाये थे कभी।
 दिन ढल रहा थासाथ ही साथ पापा के दिल की धड़कने बढ़ रही थी, " बस 14-15 घंटे फिर तो ये चली ही जायेगी। 12 घंटे बाद तो हम कन्यादान कर रहे होंगे। थोड़े-थोड़े समयके बाद पापा समय जता रहे थे कि समय रेत की तरह फिसलता जा रहा है या यूँ कहो कि खुद को समझा रहे थे कि बेटी को तो विदा करना ही पड़ेगा। लेकिन उनकी इन बातों से गुड्डो बार-बार चिढ़ जाती। और झुँझलाकर कहती "सुनो पापाअब आप ऐसा बार-बार कहोगे तो मैं नहीं कर रही शादी। एक तो मेरा वैसे ही दिमाग खराब हैउस पर आपका बार-बार ये बात कहना मुझे बहुत डिस्टर्ब कर रहा है। अब आपने फिर ऐसी कोई भी बात कही तो मैं सच में शादी नहीं करुँगीचाहें फिर आपका वो होने वाला दामाद मेरे आगे हाथ-पैर ही क्यों ना जोड़े?" उसकी इन्हीं बातों से तो घर में रौनक थी। ये इठलानाइतरा-इतरा कर बात करना। अपनी ऊल-जुलूल धमकियों से अपनी बात मनवाना। पापा ने हंसकर जवाब दिया, " अच्छाचल अब तू जा मेरा दिमाग ना खा। बहुत सारे ज़रूरी काम करने हैं। अच्छा है तेरी शादी हो रही हैघर में से एक तूफ़ान कम होगा।" "हाँ-हाँचली जाउंगी न तब याद करोगे मुझे।तब इसी तूफ़ान को बुलाने के लिए मिन्नतें करोगे तब खाऊँगी में भाव देख लेना।गुड्डो की शैतानियाँ आज सबको कुछ ज़्यादा प्यारी लग रही थीं।पापा मैरिज होम जाकर काम संभालने लगे और गुड्डो मम्मी साथ मिल कभी रस्मों को निभाती तो कभी अपने ले जाने वाले सामान को बार-बार देखती कि कहीं कुछ ज़रुरत का सामान छूट तो नहीं रहा। तभी गुड्डो के फ़ोन की घंटी बजी। पापा का फ़ोन था, "बेटातूने खाना खा लिया क्या?" "नहीं तो अभी कहाँ खाया?" गुड्डो ने मासूमियत से जवाब दिया। मैं न तेरे लिए यहाँ से खाना भेज रहा हूँ। और एक अलग टिफ़िन में तेरी पसन्द की मेवाबाटी। तू अच्छे से खा लेना। वो टिफ़िन सिर्फ तेरे लिए। और कुछ चाहिए तो बता?" "आप आ रहे हो क्या?" इस बार गुड्डो की आवाज़ बहुत उदास थी। पापा उसकी उदासी का कारण समझ बोले, " नहीं मैं तो नहीं आ रहा लेकिन तू कहे तो आ जाऊँगा।" "नहीं रहने दो आप भइया के साथ टिफ़िन भेज दो।दोनों ने उदासी से फोन रख दिया। लगभग एक घंटे बाद भइया आयेवो अलग वाला टिफीन लेकरजिसमें गरम-गरम पूड़ीआलू की सब्जीबथुए का रायता साथ ही एक अलग छोटे टिफ़िन में दो पीस मेवाबाटी के थे। उस टिफ़िन में जितना खाना थाउससे कहीं गुना ज़्यादा प्यार था। जिसे देखते ही गुड्डो की आँखें छलक गयीं।
 शादी की तैयारियां चरम पर थीं। पापाभइयाजीजाजी सब हर तरह से शादी के हर पल को यादगार बनाने में जुटे थे।  सजावटस्वागतआदर-सत्कारथाल-भोजसारी तैयारियां शाही थीं। गुड्डो को तैयार होने के लिए पार्लर जाना था लेकिन उसका तो जैसे हिलने का भी दिल नहीं था। बार-बार फोन पर निगाह जाती और चिड़चिड़ा कर रह जाती। "क्या हुआ है?क्यों चिड़चिड़ा रही है?" मम्मी ने फेस एक्सप्रेशन को समझते हुए पूछ लिया। "मुझे पार्लर लेकर कौन ले जाएंगे?"मुँह बनाते हुए गुड्डो ने पूछा। मम्मी ने समझाते हुए जवाब दिया"कोई भी भइया गाड़ी पर लेकर चला जाएगातू टेंशन मत ले।" "मुझे पापा के स्कूटर पर जाना है।बहुत धीमी सी मानो खुद से कह रही हो गुड्डो ने बोला। उसकी ये बात कोई सुन भी नहीं पाया। परिस्थितियों को समझते हुए गुड्डो ने दोबारा अपनी ख्वाहिश दोहराई भी नहीं। चुपचापसोफे के कोने पर बैठ भइया के आने का इंतज़ार करने लगी। आस-पास सब किसी न किसी भाग-दौड़ में लगे थे। कोई अपना सामान ढूंढता तो कोई गुड्डो का। कोई मैरिज हॉल से आ रहे फ़ोन को रिसीव कर वहाँ की ज़रूरत के सामान की लिस्ट बनाता। लेकिन अब गुड्डो कुछ गंभीर थी। परायापन महसूस कर रही थी। और करती भी क्यों नहींघर की सबसे कमेरी लड़की आज फ़ालतू बैठी थी। घर के सब लोग कामों में जुटे थे लेकिन वो बस सबको भागते देख रही थी। उसकी गंभीरता को तोड़ते हुए उसका फोन बजा। पापा का फोन था। "बेटाकोई बाइक खाली नहीं हो पा रही है। तू पार्लर मेरे स्कूटर पर चली जायेगी क्या?  मैं लौटते समय तुझे लेने के लिए कार भेज दूंगा। गुड्डो की तो जैसी सारी तमन्ना ही पूरी हो गयी थीं। आवाज़ नहीं निकल रही थी तो बस हाँ ही बोल पायी। फ़ोन रखते ही आँखों में तमाम आंसू आ गए। "पापा को अपने स्कूटर पर बैठाने के लिए अब पूछना पड़ेगा क्या?"सोचते हुए सबसे छुप सुबक-सुबक कर रोने लगी। थोड़ी देर में पापा ने आवाज़, "गुड्डोचल मैं ही लेकर जाऊँगा तुझे अपने साथ स्कूटर पर।ये सही समय था खुलकर रोने के लिए तो बस चिपक कर रोली। और फिर निकल पड़ीदुल्हनियां बनने पापा के स्कूटर पर। रास्ते भर पापा की पीठ से चुपककर सालों की याद को मिनटों में जीने की कोशिश करने लगी थी गुड्डो। तभी स्कूटर रुका और पापा बोले। चलअब जा तुझे लेने  भइया को भेजूंगा। उदासी भरी आँखों से पापा को बस देखती रह गयी गुड्डो।

बिलकुल सजी-धजी तैयार खड़ी थी गुड्डो। दुल्हन के गेटअप में खुद को भी नहीं पहचान पा रही थी। इतनी बड़ी कब हो गयी वो?? आज अपनी सुंदरता पर जी भर कर इतरा सकती थी वो लेकिन आज इतराने के बजाय उदास थीवो चंचल गुड्डो। वो आज सजी थीकिसी और के लिएवो सजी थी अपनों से दूर जाने के लिए। इतना मेकअप तो दूर अगर थोड़ी डार्क लिपिस्टिक भी लगा लेती तो अच्छी खासी डांट पड़ती थी। अचानक उसका मन वो डांट खाने के लिए तड़प उठा। तभी भइया की आवाज़ आई चल बेटा गुड्डोगाड़ी आ गयी है। गुड्डो उसी उदासी के साथ आकर कार में बैठ गयी। मैरिज हॉल में उतरते ही सारी निगाहें उस पर आकर जम गयीं। लेकिन उसकी निगाहें बस पापा को ढूंढ रही थीं। एक बार पापा दिख जाएँ और उछल कर उनसे पूछ ले कि "कैसीलग रही हूँ?" पापा दूर खड़े होकर उसे देख धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे या यूँ कहो आज पहली बार बेटी की सुंदरता पर इतरा रहे थे। बरात आईवरमाला हुयीउसके बाद फॅमिली और रिलेटिव्स का फ़ोटो सेशन शुरू हो गया। गुड्डो स्टेज पर बैठपापा को यहाँ से वहां भागते हुए देख रही थी। तभी फॅमिली फ़ोटो के लिए पापा स्टेज पर आये और फ़ोटो खिचवा कर जाने लगे तभी गुड्डो ने उनका हाथ पकड़ फूट-फूटकर रोना शुरू कर दिया। सिर पर प्यार से हाथ फेर बोले पागलचुप हो जा।"और इतना बोल फिर अपने कामों में मशगूल हो गए। रस्में होती रहीं। कन्यादान के समय पंडित जो कहता करते जातेकभी कन्यादान को सबसे बड़ा सौभाग्य मानने वाले सिर झुका कर बस पंडित की बातों पर मानने पर मजबूर थे। मानोबस रिवाजों का बंधन हो जो पूरा करना ही थावरना कोई क्यों अपनी लाडो को खुद से दूर करता। बेटी को पैरों से हाथ नहीं लगाने देतेकहते पाप होता है और आज बार-बार उसके पैर छू रहे थे। एक बार भी उससे नज़र मिलाने की तो जैसे हिम्मत ही नहीं थी बस रिवाज थे जिन्हें वो निभा रहे थे। फेरे होने के बाद पंडित जी बोले "विवाह संपन्न हुआअब कन्या माता-पिता के अधिकारों से दूर अपने पति की हुयी।इतना सुन पापा उस कमरे से बाहर चले गए। छोटी-छोटी रस्में अभी भी चल रही थीं लेकिन पापा नज़र नहीं आ रहे थे। कभी दूर से आवाज़ सुनाई भी दे जाती लेकिन अपनी गुड्डो के पास नहीं आये। विदा बेला आ गयी। गुड्डो सुबक सुबक कर सबसे गले मिल रही थी। पापा दूर से उसे देख रहे थे पास नहीं आये। वो पापा के पास जाकर फूट-फूट कर रोली लेकिन वो नहीं रोयेरोते भी कैसेथे तो वही "बेटी के बॉर्नहुड हीरो"। फूलों से सजी गाड़ी तैयार थी। गुड्डो कार में बैठीतभी पापा आयेबोल नहीं पा रहे थे कुछ। आवाज़ ही नहीं निकल रही थीबस दूर से आशीर्वाद का हाथ दिखाया और चले गए। गुड्डो अब विदा हो गयी थीऔर वो दूर जाती गाड़ी में अपनी गुड्डो को देखे जा रहे थे।

5 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद मार्मिक है वर्षा ये अनुभव पढना , तुमने ये कैसे लिख लिया | अपने अनुभव को लिखना बार -बार उसको जीना होता है ...

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  4. बहुत सुन्दर लिखा है वर्षा बधाई ।

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